जलूँगा,तपूँगा,नया रूप लूँगा
चलूँगा,बढूँगा,नहीं मैं रुकूँगा
मैं कोशिश करुँगा,दुखों से लड़ूँगा
नहीं आज कल तो हिमालय बनूँगा
बड़ा कुछ नहीं जो लड़ा वो बड़ा है
अभी जीतने को जहाँ सब पड़ा है
नहीं अब डरूँगा नहीं अब मरूँगा
है संसार जब तक मैं जीवित रहूँगा
जगूँगा,उठूँगा मैं सूरज बनूँगा
अँधेरों की दुनियाँ प्रकाशित करुँगा
मुखौटों के अंदर जो कातिल छिपे हैं
उन्हें अब धरा पर पराजित करुँगा
ग़लत कुछ नहीं है जो है वो सही है
जो जीता यहाँ अब सिकंदर वही है
गिरूंगा,उठूँगा मैं खुद को गढ़ूँगा
चलूँगा बहूँगा मैं दरिया बनूँगा
समा जाएँ गहराईयों में ये ग़म वो
मैं गहरे से गहरा समंदर बनूँगा
ज़माना कहेगा और कहता रहेगा
जो हाथी चला है वो चलता रहेगा
घिसूँगा,कटूँगा मैं हीरा बनूँगा
पिसूँगा,पिरूँगा मैं शीरा बनूँगा
मैं अकबर बनूँगा शिवाजी बनूँगा
जो जीते ग़मों से वो बाजी बनूँगा
भले न रहूँ पर मेरे कामों से मैं
अमर था,अमर हूँ,अमर ही रहूँगा
Written By-Nitin
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