ग़ज़ल
है दिखावे का जमाना,इसमे कोई भ्र्म नहीं है।
दानवीरो के शहर में,भूख को भोजन नहीं है।
है हुनर उनमे तभी तो चाहते हैं काम करना,
पर सुना है आज कल में काम का मौसम नहीं है।
जो सतत सुख त्यागकर,दुख का कलश पीती रही,
उसके मरने का न जाने क्यो किसी को गम नहीं है।
पाई-२ जोड्कर, घर का किया निर्माण जिसने,
आज उसकी रुखसती पर आंख कोई नम नहीं है।
सुन रहा हूँ आज कल मैं गांव शिक्षित हो रहे हैं,
फिर भी न जाने कोई क्यों खास परिवर्तन नहीं है।
घर में तानाशाह बनकर वीरता दर्शा रहे हैं,
भीड़ में एक बात भी कहने की जिनमें दम नहीं है।
क्या गलत है,क्या सही है कौन अब यह जानता है?
आज कल व्यापार में कोई किसी से कम नहीं है।
आज हर इंसान केवल पथ विजय का चाहता है,
कर सकें निर्माण पथ का ऐसा कौई श्रम नहीं है।
आपसी मतभेद ने लोगों में नफ़रत को बढ़ाया,
जख्म दिल के दूर करने का कोई मरहम नहीं है।
...............नितिन प्र्ताप सिंह..............
Comments
Post a Comment