अन्तरंग
ग़मों को दूर यारों से, मसान में छोड़ आया हूँनदी से प्यार के चलते समंदर छोड़ आया हूँ
मुझे तो देश और दिल में दिलों पर राज है भाया
सिकंदर को भी इस मसले में पीछे छोड़ आया हूँ
कोई तकलीफ तुमको हो समय रहते बता देना
मैं हर तकलीफ को अवरोध बनकर रोक आया हूँ
तेरे घर को मिटाने की जो वो साजिश रचाती थीं
उन्हीं शातिर हवाओं के मैं रुख को मोड़ आया हूँ
मिला जो प्यार तुम सब से ये मेरी खुशनसीबी है
इसी यारी के चलते मैं बरेली छोड़ आया हूँ
मुझे अब याद आया है,हुआ मिलना मेरा जिससे
वही कल कह रहा था मैं बनारस छोड़ आया हूँ
सुना घर छोड़ने की बात अब चर्चे में आयी है
तो वो बोला सुनों यारों मैं पटना छोड़ आया हूँ
तभी बोला कोई माना,मैं अपने राज्य में ही हूँ
मगर फिर भी मैं घर अपना गुहाटी छोड़ आया हूँ
ग़मों को दूर यारो से मसान में छोड़ आया हूँ
नदी से प्यार के चलते, समंदर छोड़ आया हूँ. . . .
(नितिन प्रताप सिंह)
"निभाना दोस्ती ऐसे कि फिर इतिहास बन जाये
मैं चाहता हूँ की ये किस्सा किताबों में पढ़ा जाए"
नदी से प्यार के चलते समंदर छोड़ आया हूँ...
nice one nitin
ReplyDeleteThanks bhai
Delete