सियासत और विभाजन
मेरे चुपचाप रहने से, हकीकत चुप नहीं रहती।
कलम मिट जाएगी फिर भी,स्याही मिट नहीं सकती।
सियासत छोड़ कर गर देशहित में काम करते तो,
कभी हिंदू-कभी मुस्लिम की माँ रोया नहीं करती।
सियासत दादरी में आज कल,डेरा जमाए है।
सुना है पास के मंदिर में ये पहरा बिठाए है।
जहाँ टकराव धर्मों में हुआ,अखबार कहते हैं,
वहाँ के वोट लेने हिंदू-मुस्लिम साथ आए हैं...... ....
आत्ममंथन....
सुना था कल मैंने वहाँ दंगे फसाद हुए हैं जब हकीकत मिली,तो रो रो कर वोली नितिन, वहाँ कई घर बर्बाद हुए हैं...
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