परिवर्तित अवधारणा!
हम फुटपातों से चलकर,कुछ दूर निकल आए हैं।
जल्दी-जल्दी में माँ की,तस्वीर भूल आए हैं।
दो चार दिनों में अपना कहकर हो गयी पराई,
फिर भी एक याद भी उसकी,हम नहीं भूल पाए हैं।
मुश्किल से कदम बढ़ाया, हर जगह उन्होंने रोका,
महसूस हुआ तब हमको,परदेश निकल आए हैं।
शक्लें हम जैसी ही थीं, बस बाबूजी लगते थे,
खुद जाकर उनसे बोले,हम श्रम करने आये हैं।
चिल्लाकर साहब बोले,चल निकल यहाँ से याचक,
बेरुखी देख दिल बोला,हम कहाँ चले आए हैं।
तब याद अचानक आयी,माँ आंखों में भर आयी,
शहरों की गाली खाने,हम गाँव छोड़ आए हैं।
दिल वोला घर चलते हैं, तब वुद्धि हमारी वोली,
घर वापस जाने वाली,हम राह भूल आए हैं।
क्यों प्रेम नहीं कर पाये हम प्रेम के घर जाकर भी,
विश्लेषण ने बतलाया, हम द्रव्य नहीं लाये हैं।
भौतिकता के इस युग में, हर चीज लगी है बिकने,
मानवता कैद हुई है, नम्रता भूल आए हैं।
इस कलयुग में एक माँ ही परिवर्तनशील नहीं है,
अब देखो नितिन उसी को,हम दूर छोड़ आये हैं।
वर्षों से देख रही है,उसको आँखें भर-भर कर,
जो अनजाने में अपनी तस्वीर छोड़ आए हैं।
हम फुटपातों से चलकर अब दूर निकल आए हैं,
जल्दी जल्दी में माँ की तस्वीर भूल आए हैं।
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