अधूरी आकांक्षाएं
तुम्हारी याद हाय अब,हमे जीने नहीं देती।
हवाये तेज नजरों को कभी मिलने नहीं देती।
मैं खुद को रोक भी लेता तुम्हारी शान की खातिर,
मगर शब्दों को ये मेरी कलम रुकने नहीं देती।
ये दिल बेचैन रहता है,तुम्हारी याद में अक्सर,
रिवाजों की दीवारें चैन से रहने नहीं देती।
तुम्हारे इश्क के चलते हमें बनना पड़ा गालिब,
ये बचैनी तुम्हारी चैन से लिखने नहीं देती।
मोहब्बत ठीक है लेकिन ये पागलपन नहीं चाहिये,
निर्र्थक प्रश्न की गंगा सफर करने नहीं देती।
मोहब्बत का ये पैमाना पुराना हो गया है अब,
नये निर्माण की कोशिश धरा करने नहीं देती।
मैं चाहता हूँ मोह्ब्बत में प्रथम माँ को मिले दर्जा,
समर्थन चाह का मेरी हवस करने नहीं देती।
मुझे उम्मीद है पहली पहल तुमसे शुरू होगी,
मिटेगी सोंच जो मुझको अभी बढ़ने नहीं देती।
मेरे गीतों को कल तक राष्ट्र का सम्मान मिलता था,
हकीकत की लिखावट आज वह मिलने नहीं देती।
तुम्हारे नाम को लिखकर तुम्हें प्रस्तुत किया जाता,
मगर यह राजनीतिक "टिप्पणी" करने नहीं देती ।
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