जो चलते थे सच के पथ पर,
वही पथिक पथ भ्रष्ट हुए।
जो कल थे कर्तव्यपरायण,
अधिकारों में लिप्त हुए।
रिश्ते भी पैसे के आगे,
अब देखो कमजोर हुए।
कोतवाल के दावे वाले,
आज निकम्मे चोर हुए।
रंक से राजा बनकर मद में,
अब देखो मदहोश हुए।
मीलों पैदल चलने वाले,
क्षणिक सफर में बेहोश हुए।
रहे समझते जिनको भानू,
बने तिमिर मशहूर हुए।
जिन पर सब इतराया करते,
वही क्रूर से क्रूर हुए।
जिनको जगत विजेता समझा,
वे रण में बलहीन हुए।
जिनके साथ हजारों चलते,
वे ही अब दल-हीन हुए।
समझा अब दिन सुख के होंगे,
मगर सुखद से दुखद हुए।
आज जहर ही शेष है उनमें,
कल तक जिनमें शहद हुए।
प्रेम दिलों में भरने के अब,
सभी जतन बेकार हुए।
कुछ नादानों की गलती से,
लाखों घर बर्बाद हुए।..
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