कभी रहता था महलों में,वो अब दर-दर भटकता है।
जो कल आँखों का तारा था,वो अब पल-पल खटकता है।
कभी एक दौर था जब नाम लेते वह न थकता था,
वही अब नाम सुनकर वो न जाने क्यों भड़कता है।
कभी देखा था सपना मैंने भी तूफान लाने का,
बना मिट्टी का घर तूफान से अक्सर बिगड़ता है।
बड़ी मजबूत इमारत क्यों डरे तूफान के डर से,
तबाही किसको कहते हैं,वो बस मलबा समझता है।
हर एक तूफान तबाही की वजह हो,मैं नहीं कहता..
भँवर से दूर बैठा जो किनारा,वो ये कहता है।
कभी जो शान से ही पेट अपना भर लिया करता,
वो अपनी भूख से अब हर घड़ी लड़ता -झगड़ता है।
चिलकती धूप की गर्मी, ये क्या जाने महल वाले,
जो रहता झोपड़ी में है,ये बस वो ही समझता है....
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