परिंदा चल दिया...
मनुज मंजिल की ख्वाहिश में,
दोबारा चल दिया फिर से।
खुदा जब सामने आया,
तो सजदा कर लिया दिल से।
हुआ मद्धम उजाला,
शाम भी ढलने को आयी है-
परिंदा घर के रस्ते पर,
दोबारा चल दिया फिर से।
अचानक शाम एक छत पर,
परिंदा मिल गया मुझसे।
मेरी ताकत को उड़ने की,
नसीहत दे गया फिर से।
समय कम था उसे भी
लौटना जल्दी पड़ा घर को-
मैं जल्दी फिर मिलूंगा तुमसे,
इतना कह गया मुझसे।
यही कहकर अचानक वह,
गगन में उड़ गया फिर से।
मिलन और प्रेम के चलते,
विदाई ले गया मुझसे।
हैं दो बच्चे जो उसकी याद में,
सोये नहीं अब तक-
इसी खातिर अँधेरे से,
परिंदा लड़ गया फिर से।
अँधेरा था गगन में और,
कुछ वीरानगी भी थी-
उन्हें जल्दी हराकर शान से,
वह उड़ लिया फिर से।
परिंदा घर के रस्ते पर,
दोबारा चल दिया फिर से।
Comments
Post a Comment