प्रगति का पाठ भारत ने,
प्रथम जग को पढ़ाया था।
जगत में सभ्यता अस्तित्व में,
भारत ही लाया था।
तुम्हारी साक्षरता दर बढ़ी है,
मानता हूँ मैं.
मगर पश्चिम में शिक्षा की लहर,
भारत ही लाया था।
हमें तालीम और तहजीब,
तुम कैसे सिखाओगे?
नालंदा की दीवारों में,
तुम्हें पढ़ना सिखाया था।
यकीनन तुमको मेरी बात का,
विश्वास न होगा..
मगर शिक्षा ने भारत को,
जगत का गुरु बनाया था।
अगर दिल में कोई शंका रहे,
इतिहास पढ़ लेना...
प्रमाणों ने महा पुरुषों का,
भारत घर बताया था।
कई आए-गए बेशक,
मगर हम प्यार से बोले...
जब आए घर हमारे तुम,
तुम्हें मेहमान बनाया था।
कहा तुमने-"हमें तुमसे"
महज व्यापार करना है...
मगर तुमने तो साजिश से,
हमारा घर चुराया था।
हमें धोखा दिया तुमने,
हजारों घर जला डाले...
पनाहों में रहे जिनकी उन्हें,
बेघर बनाया था।
हमारी खुद की गलती थी,
नहीं तुम चीज भी क्या थे....
हमारे देश की समृद्धि को,
तुमने चुराया था।
वही चर्चिल जिसे तुम ,
राजनीतिक गुरु समझते हो..
उसे भारत के एक बेटे ने,
शब्दों से हराया था।
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