गाँव जिसने जिंदगी भर, प्यार की भरमार दी।
साधनों की थी कमी पर,परवरिश दमदार की।
एक दिन रोजी कमाने गाँव से रुखसत हुए, लौट न पाए कभी घर,कोशिशें कई बार कीं।
हम आज सापेक्षता के वशीभूत इस कदर हो चुके हैं कि अपने वजूद की पहचान ही खो बैठे हैं । आज हमारी संस्कृति,हमारी भाषा, हमारे खानपान में जो बदलाव की लहर चली है ,उसे रोक पाना नामुमकिन सा प्रतीत होता नजर आ रहा है । हमारा यह तथाकथित तुलनात्मक रवैया विकास के नाम पर विनाश की संस्तुति रचता जा रहा है ।
इतनी बेहतर शिक्षा प्राप्त करने के बाद भी हमारी सोंच पाशचात्य परिवेश के आगे घुटने टेकते साफ़ नजर आ रही है ।
हमारा नजरिया झूठे सम्मान के नाम पर गुमराह किया जा रहा है, हम जिस परिवेश के कभी हुआ करते थे आज वही परिवेश हमें तुच्छ मह्सूस होता है, हमें अपनी क्षेत्रीय भाषा बोलने में अपमान महसूस होता है, हमारे सर्वश्रेष्ठ विद्वान् जो आये दिन बड़े बड़े शैक्षणिक संस्थानों में भेदभाव ,जातिवाद ,ऊंच-नीच,को जड़ से मिटाने की बात करते हैं, वही लोग अपनी वास्तविक जिंदगी में द्वैतवाद का खेल खेलते हैं ।
जो देश की अखण्डता एवम एकता की बात करते हैं वही कश्मीर,जेएनयू ,पूर्वोत्तर जैसे क्षेत्रों एवम संस्थानों में हिंसात्मक बातें फैलाने की कोशिश करते हैं । खैर यह दशा तो उन तथाकथित लोगों की है जिनकी उम्र ने उनके सर के बाल सफ़ेद कर दिए हैं, और यह सफ़ेद रंग हमें यह बताने की कोशिश में है कि हर सफ़ेद चीज़ अमन और चैन का प्रतीक नहीं होती। इसलिए दुःख तो होता है लेकिन कम होता है।
लेकिन सबसे बड़ी विडम्बना तो इस बात की है कि शहरों में जाकर शिक्षा प्राप्त करके आरंभ में उद्देश्य होता है कि उन्हें एक बेहतर रोजगार प्राप्त हो जिससे की वे अपने ग्रामीण क्षेत्र में रह रहे परिवार की गरीबी ख़त्म करने कीआशाएँ जीवित रख सकें लेकिन न जाने किस पुनर्जागरण के आवेश में आकर एक बालक से युवा कहलाने वाला व्यक्ति स्वयं को इतना तार्किक बना लेता है कि अपनी हर गलती को स्वयं ही तर्कों के माध्यम से सही समझकर एक अच्छे व्यक्तित्व की झूठी परिकल्पना करने लग जाता है ।
आज हम अपनी क्षेत्रीय पहचान को पहचानने से इनकार कर रहे हैं । हमें यह डर है कि हमारी संस्कृति में पिछड़ापन है और अगर यह बात हमारे समाज को पता चलेगी तो हमारी औकात कम हो जायेगी या फिर पल्लवी बुरा मान जायेगी। सबसे बड़े दुःख की बात है कि यह चीजें उन शिक्षण संस्थानों में भी फैली हैं जो शिक्षा के क्षेत्र में सबसे अव्वल माने जाते हैं ,जहां भारतीय ग्रामीण क्षेत्रों से तमाम प्रतिभाएं बहुत मेहनत के बाद प्रवेश पाती हैं।
वे वहां पहुंचकर सफलता से ज्यादा दिखावे की होड़ में पीछे मुडकर नहीं देखते। फिर वे वापस लौटकर उन बगीचों में जाना पसंद नहीं करते जहां कभी वे जी भर के खेलना पसंद किया करते थे, उन्हें वे खेत याद नहीं रहते जो आज भी उनके वर्तमान मुकाम के सबसे प्रमुख दावेदार हैं। हम बात करते है कि आज भी गाँव इतने पिछड़े क्यों हैं ? क्या इस प्रश्नन का उत्तर उपर्युक्त वक्तव्य में नहीं मिलता है? हालात इस कदर बिगड़ चुके हैं कि लोग कुर्सी पर बैठने के बाद उस चारपाई को भूल रहे हैं जिसने हर स्थिति में उन्हें सहारा दिया ।
गाँव शहर से बेहतर हैं या खराब हैं, बात यह नहीं है, बात तो बस विचारों के परिवर्तन की है जिसके चलते लोग उस जगह को हीन भावना से देखते हैं जहां उनके जीवन का सर्वक्षेष्ठ हिस्सा (बचपन)व्यतीत हुआ । धन्य हैं वे लोग जो आये दिन बचपन को याद कर लिया करते हैं भले ही तस्वीरें माध्यम बनें, इस बात का फर्क नहीं पड़ता । वरना समय तो सोने का भी नहीं है । हम दिखावे में इस कदर वह गए कि देखना ही बंद कर दिया ।
आखिर हम किन अवधारणाओं पर भविष्य के निर्माण की बात कर रहे हैं। दिक्कत पश्चिम से नहीं है, उनके जैसी ड्रेस पहन लेने से हम पश्चिम के नहीं कहलाये जाएंगे,अगर इतना ही भारतीय होने पर शर्मिदगी है तो पश्चिम के मानवीय मूल्यों को भी अपनाओ जिसमें अपनी संस्कृति से अगाध प्रेम की प्रथम परिकल्पना का समायोजन किया गया है।
जहाँ तक इतिहास है वहां तक भारतीय सभ्यता की बात की जाती है, फिर आज अचानक संदेह क्यों होने लगा। हमारी सभ्यता हमारी संस्कृति विश्व में अनोखी है, हमारे गाँव ही हैं जो शहरों की औकात को अब तक जीवित रखे हुए हैं। इसकी सुरक्षा हमारे कन्धों पर निर्भर करती है। उन तमाम तकनीकी एवम बेहतरीन दिमाग रखने वाले लोगों से बस यही गुजारिश है कि तुलना भी करो तो बेहतर इंसान बनने के लिए वरना गुंडे तो गली-गली मिल जाते हैं ।
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